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Wednesday, March 22, 2017

कल्पना झा की कविताएँ



कल्पना झा
कल्पना झा मूलतः रंगकर्मी हैं। कॉलेज के दिनों से ही मंच पर अभिनय करती रही हैं और दर्शकों का दिल जीतती रही हैं। उनके द्वारा अभिनित नाटक अंगिरा के देश भर में कई मंचन हो चुके हैं। कल्पना ने प्रसिडेन्सी कॉलेज से साहित्य में एम.ए. किया है और भारत सरकार के एक दफ्तर में कार्य करती हैं।
उनकी कविताओं पर कुछ भी कहना बेमानी है। इसलिए यहाँ प्रस्तुत है उनकी कुछ ताजा कविताएँ। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही।



समय के पार माँ  
                                                                                                                                                           
बताओ तो मैं कौन हूँ? – बेटी पूछती है
और बूढ़ी आँखें टटोलती रहती हैं एक नाम
कि पुकार सके, पहचान सके
उम्र भर लिए गए तमाम नाम
उसकी कमज़ोर पड़ चुकी नसों में घुमड़ते हैं
ढूंढ लाती है वह एक नाम
अतीत के खोह से  - मुंद्रिका हो?
नहीं माँ
चन्द्रिका?
 ना..

ऑंखें ढूंढती रहती हैं चेहरे का नाम
पहचानी सी आवाज़
गाल, भवें, ठोढ़ी, ललाट सब जाने पहचाने
कौन है ये, जो आती है अक्सर मेरे पास
बैठती घंटों
सदियों से कौन जाने  हाथ की उंगलियां
आदतन चेहरा सहला देती है
सर पर हाथ फेरती है

नाम याद नहीं कर पाती  माँएं
जब बूढी हो जाती हैं
तब वे सिर्फ दो धुंधली ऑंखें भर रह जाती हैं

माँ, मैं इंदिरा, तुम्हारी बेटी
तुमने ही तो नाम रखा था न  - वह फिर याद दिलाती है
गूंजती है आवाज़ें फिर –
 भगवती के चार गीत गाओ कम से कम
कनिया सब खोइंछा भरने को बारी से दूब तोड़ ला
बिसेसस्वर बौ  धोती दू जोड़ी
लाल दू जोड़ी
पियर रंगना
दलपुरी के आटे में मोईन डालना न भूलना
भार जायेगा बेटी के ससुराल
लड्डू मीठा ठीक बने
चाशनी का तार देखना हलवइया
अंगना गोबर से लीपना भोरे
घुमड़ती है चार पीढ़ियों की जन्मकुंडलियाँ
ग्रह दोष
उसके काट
एक साथ कमज़ोर तंतुओं पर
स्मृतियों का शोर भारी पड़ता है

एक चमक आकर लौट जाती है
धुँधलायी आँखों में
और समय के पार माँ फिर ढूंढती है
बहुत से नामों में से एक नाम

बेटी ख़ुद को धीरे धीरे
उन अपरिचित आँखों में बदलते देखती है ।


टूटी पंखुड़ियों वाला गुलाब


कॉलेज के मुख्यद्वार पर
जब सारे गुलाब बिक गए
सबकी देखा देखी
आख़िरी बचा रह गया
टूटी पंखुड़ियों वाला गुलाब घर ले गया वह

झोली वाला हाथ सामने
और गुलाब की कचक चुकी डंडी को
बड़े ध्यान से पीठ से टिका
धीरे से किवाड़ खिसका
चौखट पार किया
दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत की
उघड़ी पीठ निहारता रहा कुछ देर
उसके उलझे बालों में फूल खोंसने बढ़ा ही था
कि लपक कर मुड़ी लुगाई ने
अपने हाथों में जाने कब से सना हुआ तरकारी और भात का निवाला
उसके मुंह में झप्प से भर दिया
और खिलखिला दी ज़ोर से

पीले दांत चमके कुछ ऐसे
कि किवाड़ की फांक को चीर कर
रोशनी दरवज्जे पर बैठ गई लजा कर
उसने देखा था घुटनों पर बैठ प्रेम निवेदन करते लोगों को
कसमसा रहा था कि वैसे ही नक़ल करे
और फ़िल्मी अंदाज में
अपने पसंदीदा मुकेश का गाना गाते गाते कह डाले
जो कभी न कहा था

फिर
उसने बड़े करीने से कुछ पंखुड़ियों वाला गुलाब
जड़ दिया उसके बालों में
और उसे झोंटे से अपनी ओर खींच कर कहा –
सुन, आज कंघी न करना तू।


खिड़कियाँ

मैं खिड़की से लग कर
जब भी आसमान देखना चाहती हूँ
मुझे दिखती हैं कई कई खिड़कियां
और उनसे झांकती
कई कई जोड़ी आँखें

जब शाम की लाली ढूंढती हूँ
तो दिखती हैं उन आँखों की रक्ताभ शिराएं
जिनके लिए खिड़की एक कोना है
आँख बचाकर बरसने के लिए
कई बेमौसम बरसातों में
जब छई छपा करते हैं लोग
तो दरअस्ल कहीं भीग रहे होते हैं
खिड़कियों से सटे कई वजूद

जब कई दफा बारिश अचानक थम जाती है
तो दरअसल उन आँखों को
झट से पोछ लिया गया होता है
कि उन्हें कई आहटों पर संभलना होता है
कई पुकारों पर लौटना होता है
अपनी दिनचर्या में मुस्कुराते हुए

खिड़की वहीं रहती है
उनके लौटने के इंतज़ार में
वह कहीं नहीं जाती।


जाने के बाद भी

हाथ बहुत देर तक
हवा में हिलते रहते हैं
और नोर धीरे धीरे सूख जाते हैं

मुड़ के देखने पर भी न दिखे वो जब
आश्वस्ति हो तो लौटते हैं
शरीर अपने अपने घर

जब कोई कहीं से चला जाता है
तो छूट जाती है पीछे
उसकी गंध
कोई रुमाल या अंगोछा
और वो बसता रहता है
वहां बहुत देर तक
वहां से चले जाने के बाद भी।

***



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, March 15, 2017

इंदिरा दाँगी की नई कहानी




इंदिरा दाँगी समकालीन युवा कथा साहित्य के क्षेत्र में एक चर्चित नाम है। उनका पहला कहानी संग्रह एक सौ पचास प्रेमिकाएँ ही बहुत चर्चित रहा था – उनके उपन्यास हवेली सनातनपुर पर भारतीय ज्ञानपीठ का संस्तुति पुरस्कार और साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। हाल ही में प्रकाशित उनका नाटक आचार्य बेहद चर्चित रहा। इंदिरा जी भोपाल में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही है। अनहद पर प्रस्तुत है उनकी नई कहानी।


बकरी
इंदिरा दाँगी
वाल्मी पहाड़ी पर पहुँचकर अनीता ने अपनी बकरी चरने छोड़ दी और ख़ुद पत्थरों के टीले पर एक बड़े पत्थर की ओट में आ बैठी। रात ओले गिरे थे; सुबह से जानलेवा सर्द हवायें चल रही हैं। अनीता के पास गर्म शॉल कहाँ; रात जो चादर बिछाकर सोती है, सुबह वही ओढ़ आती है। चादर के भीतर उसने दो फटी षर्टें पहन रखी हैं जो पड़ोस में रहने वाले उसके किसान भाईयों की हैं; माँ जब-तब इतनी ही मदद कर पाती है अपनी विधवा-अनाथ बेटी की।
           वो आसपास देखती है। झाड़ियों, टहनियों से लेकर घास तक भीगा हुआ; आग नहीं जलाई जा सकती है। दूर, सिंदूरी बल्ब-से रोषन सूरज की ओर वो देखती है जैसे देखने भर से कुछ गर्माहट मिल जायेगी उसकी ठंडाती पसलियों को।
                          उगते सूरज की दिशा को जाती सड़क पर स्कूल युनीफ़ार्म में जाती अपनी सात बरस की बेटी को अनीता आवाज़ देती है,
‘‘डिब्बा में रोटी रख ली थी ?’’
‘‘डिब्बा नहीं अम्मा, टिफ़िन।’’
‘‘ओ वही। रास्ते में मडिया देव को प्रणाम करना भूलना नहीं।’’
बेटी आगे बढ़ जाती है। अनीता हर दिन वाले चिंतित चेहरे के साथ फिर उन्हीं ठंडे प्रस्तरों पर लौट आती है। ज़माना कितना ख़राब है लड़कियों के लिए; वो सूने रास्ते को देखती सहमकर सोचती है। ...लेकिन ज़माना तो हमेषा ही ख़राब रहा है लड़कियों के लिए ! फिर वो ये सोचती है और अपनेआप से कहती है,
‘‘अम्मा ने पहाड़ से नीचे गाँव के स्कूल का कभी मुँह न देखने दिया। आज चार अक्षर जानती होती तो किराने की दुकान ही डाल लेती, नहीं तो फेरी लगा-लगाके कुछ बेचा करती। लेकिन सब रोज़गारों में विद्या लगती है और विद्या तो स्कूल जाये ही आती है।’’
‘‘क्या बड़बड़ा रही हो अकेली ?’’
जमुनिया ने अपनी तीनों बकरियाँ उसकी बकरी के पास छोड़ दी हैं। अपने दोनों हाथ एक-दूसरे से घिसती उसके पास आ बैठती है।
‘‘ठंड बहुत है।’’ -अपने फटे षॉल से आधा चेहरा ढाँप लिया उसने।
‘‘कुछ दिन चढ़े तो हवा सूखे। तब आग जला लेंगे।’’ अनीता कुछ गीली टहनियाँ बटोरकर पत्थरों पर रख लेती है।
‘‘जो न सूखी हवा तो भी दिन तो काटना ही है, जैसे सहन हो !’’
जमुनिया पत्थरों पर बैठी अब बकरियों की ओर देख रही है। उसकी तीनों बकरियों के साथ अनीता की उन्नत नस्ल की बरबरी बकरी चर रही है। बकरी गाभिन है।
‘‘पूनम तक ब्या जायेगी तुम्हारी बकरी।’’
‘‘हूँ। उम्मीद तो है। मड़िया देव रक्षा करें।’’
पहाड़ी गाँव के नीचे जंगल में किसी पेड़ तले चार-छह ईंटों से बनी नन्ही मड़िया को ही अपनी रक्षक मानती है अनीता। मन-ही-मन स्मरण किया। देव! जीवन की पूँजी की रक्षा करें -स्कूल जाती बेटी और सामने चरती क़ीमती बकरी।
‘‘पूरे गाँव में बरबरी बकरी एक तुम्हीं ख़रीद कर लाई हो!’’
‘‘अपनी चाँदी की हँसुली भी तो बेची है भाभी। तन का आख़िरी ज़ेवर था।’’
‘‘चाँदी बेचकर ली है तो सब चाँदी ही कर देगी ये तुम्हारे घर में। साल भर में देखना, माँ-बेटी के तन पे भले कपड़े होंगे और घर में आटा-दाल।’’
जमुनिया भाभी कितना षुभ-षुभ बोलती हैं। तभी तो अनीता अपना मन बाँटती है एक उन्हीं से।
‘‘इससे जो बकरे होंगे भोपाल की मंडी में बेचूँगी ईद पर। फिर मेड़ा पालूँगी। बस ये बरस कैसे भी कट जाये हम माँ-बेटी का !’’
‘‘तुम्हारे भाईयों ने बहुत बुरा किया तुम्हारे साथ। दोनों मिलकर दस बीघा के खातेदार हैं सो खेत भी पुरखों के; लेकिन बीघा भर भी ज़मीन न दी घर की अनाथ-विधवा बेटी को ! और कैसी तो तुम्हारी माँ है; अपनी ही कोख जायी की दुष्मन!’’
‘‘नहीं भाभी! अम्मा ने इत्ता तो किया है कि उनके घर के पास मुझे झोपड़ी डालने दी है। कभी भाभियों से छुप-छुपाकर झोली भर अनाज, नहीं तो दो मुट्ठी षक्कर ही दे जाती हैं। मैं तो मना करती हूँ।’’
‘‘बेचारी रांड बुढ़िया करे भी तो क्या ! उसे तो अपनी ही रोटियों के लाले हैं दो बहुओं की मालिकी में। आदमी के जीते जी तक ही औरत हाथी के ओहदे पर सवार रहती है।’’
अनीता को अपना पति याद हो आया। ससुराल के बड़े कुनबे का खेती से पूर न पड़ता था। क्रेषर पर काम करने चला गया था वो। पत्थर का काम करते, तीन-चार सालों में ही उसकी साँसों में इतना पत्थर पहुँच गया कि फेंफड़े ख़राब हो गये। ससुराल से न साथ मिला, न इलाज के लिए पैसा। तीन महीनों तक वो सरकारी अस्पताल में अपने रोगी पति को लिए पड़ी रही। नरक जैसा जीवन जिया उसने वहाँ अपनी बच्ची के साथ। अस्पताल में बेड ही न मिला। जनरल वार्ड की गंदगी के एक कोने में चादर बिछाये पति को लिटाये रहती थी। कभी-कभार डॉक्टर आते थे। कभी दवायें मिलती थीं, कभी मना कर दिया जाता था। नर्सों की गाली-गलौच और वार्ड के सफाईकर्मियों की गंदी नीयतों के बीच वो कैसे भी रहती रही अपने रोगी के साथ वहाँ कि उसका पालनहार जी जाये! -पर हे मड़िया देव! उसकी मौत तो जीवन की सबसे अभागी स्मृति है। लाष को ससुराल के गाँव तक ले जाने को एम्बुलेंष तक न दी थी ज़िला अस्पताल ने। कंधे पर पति की लाष उठाये, बेटी की कलाई थामे पूरे पन्द्रह किलोमीटर पैदल चलकर ससुराल पहुँची थी अकेली अनीता। ...और पति की तेरहवीं के दिन लात मारकर देहरी से बाहर कर दी गयीं माँ-बेटी ...रांड जनी का क्या हिस्सा जायदाद में ??
धूप कुछ बेहतर होकर चमकी है। जमुनिया और अनीता ने लकड़ियाँ और सूखे पत्ते इकट्ठे कर आग जला ली है।
‘‘बेटी तो तुम्हारी यहाँ आते ही स्कूल जाने लगी। झोपड़ी भी तुमने खड़ी कर ली। घर चल कैसे रहा है लेकिन ?’’
‘‘एक पीतल का लोटा था वज़नदार और एक जोड़ी छोटी पायल थी गाँठ में। एक थाली भी थी काँसे की। सब बेच दिया परसों और आटा-चावल ले आई नीचे हाट से। अभी दो-तीन रोज़ तो हम माँ-बेटी दोनों वक़्त खा लेंगी। तब तक मेरी मजूरी मिल जायेगी।’’
‘‘कौन-सी मजूरी ?’’
‘‘काये मज़ाक करती हो भाभी? हमने-तुमने साथ ही तो पंचायत के लिए नाली-खुदाई में मजूरी की थी। तुम अपनी मजूरी ले आयीं ? मैं तो कल गई थी तो सरपंच साहब कहने लगे, अभी सरकार के पास रुपया ख़त्म हो गया है। दो-तीन दिन बाद पइसा आयेगा तब आना।’’
‘‘लगता है मुँह अंधेरे ही बकरी लिए चराने चली आयीं। अरे! गाँव में तो उजाला होते ही षोर हो गया। तुमने नहीं सुना ?’’
‘‘क्या ?’’
‘‘सरपंच, सचिव दोनों फरार हो गये हैं!’’
‘‘क्या ???’’
‘‘हाँ, गाँव के हर कच्चे-पक्के मकान में एक-एक षौचालय बनवाने को सरकार से रुपया लिया और खा गये। आज सुनते हैं, पुलिस आनी थी गिरफ़्तार करने सो दोनों मुँह अंधेरे ही फ़रार हो गये।’’
‘‘अब मजूरी हमारी ?’’ -अनीता की आँखें डबडबा आयीं।
जमुनिया के दिल में आया, कह दे भूल जाओलेकिन वो कह न सकी।
आग तापते अनीता ने कपड़े का टुकड़ा खोला। रात की बची एक रोटी वो आते समय लेती आई थी, बाक़ी दो रोटियाँ बेटी के लिए छोड़ आई थी। एक उसने खाई होगी, एक स्कूल ले गई होगी।

आग में सेंककर अनीता अपनी रोटी खाने लगी। जमुनिया ने अपने खाने के डिब्बे में से अचार की फाँक और प्याज का टुकड़ा निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया। अनीता ने चुपचाप वो भी खा लिया।
‘‘अनीता बिन्नू, तुम तनिक बकरियाँ देखना। घर के कछू काम निबटाकर आती हूँ अभी।’’
जमुनिया चली गई। अनीता जानती है, वो दोपहर ढलने से पहले नहीं लौटेगी। ...अचार की फाँक और प्याज के टुकड़े तक की क़ीमत वसूल कर लेते हैं लोग !
बकरियाँ चर रही हैं। आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा। अनीता जल्दी से पास के पीपल पर चढ़ गई और पत्ते तूपने लगी। कोई देख न ले; पेड़ पर स्त्रियों का चढ़ना मना क्यों है ? कम-से-कम उन स्त्रियों के लिए तो मना नहीं होना चाहिए जिनकी बकरी रात में भूखी रहती है। अनीता जल्दी-जल्दी पत्ते तूपकर नीचे बिछे अपने चादर पर फेंकती जा रही है। किसी भी चरवाहे के इस तरफ़ आने से पहले वो बकरी की रात भर की खुराक इकट्ठी कर चादर को बाँधकर रख देगी एक ओर। थोड़े से ही पैसे हाथ में आते ही वो सबसे पहले एक हँसिया ख़रीदेगी। फिर पीपल पर नहीं चढ़ा करेगी; बबूल और बेरी की झाड़ियों की टहनियाँ काटकर घर ले जाया करेगी।
                                        अनीता का ध्यान पीपल के पत्ते तेज़ी से तूपने और हँसिया ख़रीदने की ख़्वाहिष के बीच खो गया और वो प्रकृति के माहौल में हो रहे उन परिवर्तनों-चेतावनियों को नहीं भाँप पाई जो होती हैं -जब कोई हिंसक आता है !
अचानक बकरियों की तेज़ मिमियाहटों-रिरियाहटों से हवा चीख़ उठी। ...और सबकी आवाज़ों में षामिल जिसकी आवाज़ नहीं हो सकी, वो अनीता की ही बकरी थी ! जब तक अनीता ने पीपल से नीचे देखा, तेंदुआ उसकी बकरी की गर्दन दबोच चुका था।
‘‘ओ मेरी बकरी !’’ ऊँचे पीपल से कूदकर आधे पल में ज़मीन पर आ गई अनीता।
तेंदुए को उसने कमर से पकड़ा और अपनी पूरी ताक़त से खींचकर एक ओर को फेंक दिया। जानवर पत्थरों पर जा गिरा।
अनीता ने बकरी को गले लगा लिया। नहीं ! घाव गहरे नहीं। बच जायेगी।
वो घाव देख ही रही है कि दौड़कर आया तेंदुआ और उसकी बकरी का पिछला हिस्सा अपने पंजों में दबोच लिया। बकरी के गर्भस्थ बच्चों तक पहुँचा हत्यारे के पंजों का दबाव और बकरी जान छोड़ती आवाज़ में चीख़ी।
‘‘ऐ नाहर !!’’ अनीता ने नाहर की गर्दन दबोच ली एक बाँह से; और दूसरे हाथ से उसे फिर परे धकेल दिया। बकरी भागने की कोषिष में गिर पड़ी। अनीता उसे ओट देकर खड़ी हो गई नाहर के सामने -अब दाँव पर जान और जीवनपूँजी दोनों हैं !

हिंसक तेंदुआ फिर उछला हमला करने -पर अबकी षिकार बकरी नहीं, चरवाहिन है!
हमले से अनीता गिर पड़ी। तेंदुए की पकड़ में षर्ट की कॉलर आई। दो षर्टों की परतों में उसके नाखून और दाँत ठीक से जम नहीं पाये और अनीता ने फिर उसे एक ओर फेंक दिया। तेंदुए के मुँह में षर्ट के फटे हिस्से हैं। षिकार की गर्दन अब एकदम खुल गई है दाँत गपाने के लिए। अनीता ने एक मोटा पत्थर दे मारा है जो ऐन जबड़े पर लगा तेंदुए के लेकिन न वो गिरा, न उसकी नज़र हटी।
और जानवर अनीता पर निर्णायक हमला करता है। उसकी गर्दन पर दाँत, पंजे गड़ाने की कोषिष कर रहा है पषु जबकि वो अपनी पूरी ताक़त से उसके मुँह पर मुक्के मार रही है। ...कहीं दूर स्कूल में उसकी बेटी पढ़ रही है जिसका दुनिया में सिवाय अनीता के कोई नहीं !!
दो-चार-छह ...सातवें, आठवें घूँसे की ताक़त से तेंदुआ एक ओर गिर पड़ा। जानवर के मुँह से भल-भल करता ख़ून बह रहा है। ...और इससे पहले कि षिकारी सम्हलता; षिकार सम्हल गई। तापने के लिए जलाई अलाव में से एक जलती टहनी अनीता ने झपटकर उठा ली है।
दूर से दूसरे चरवाहे दौड़ते हुए इसी ओर को चले आ रहे हैं।
घायल बकरी लड़खड़ा कर खड़ी हो गई है।
लहूलुहान तेंदुआ जगल की ओर भाग रहा है; और हाथ में जलती टहनी लिए अनीता उसके पीछे दौड़ती चली जा रही है।
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संपर्कः
इंदिरा दाँगी
खेड़ापति हनुमान मंदिर के पास,
सूद पेट्रोल पंप के पीछे,
लाऊखेड़ी,
एयरपोर्ट रोड, भोपाल (म.प्र.) 462030
8109352499




 

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad