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Wednesday, October 19, 2016

यात्रा और यात्री का आख्यानः अन्तिम अरण्य - डॉ. शिवानी गुप्ता




यात्रा और यात्री का आख्यानः अन्तिम अरण्य
डॉ0 शिवानी गुप्ता

भाषायी सादगी और रोमानियत के बारीक बिन्दुओं को आत्मसात करता निर्मल वर्मा का लेखन हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधियों में से है। अपने रचनाकर्म के माध्यम से निर्मल ने मनुष्य के मन की भीतरी परतों के साथ गहन हस्तक्षेप और वैचारिक बहसों का जो सिलसिला शुरु किया था वह आज भी निर्मल वर्मा को पढें जाने की मांग करता है, इसलिए नही कि निर्मल के रचना संसार को समझना जरूरी है बल्कि इसलिए की व्यक्ति को या खुद को पूरी गहनता से समझना जरुरी है और निर्मल का रचना कर्म इसमें सक्षम हैं
            साठ के दशक का कथा लेखन जिन महत्पपूर्ण चिन्तन धाराओं को लेकर चल रहा था उसके केन्द्र में व्यक्तिमन की प्रधानता रही थी, उसमें भी व्यक्तिमन के अन्र्तरगुम्फनों को मनों वैज्ञानिक नजरिये से देखने परखने की । अज्ञेयऔर निर्मलजैसे कथाकार बखूबी अपनी भूमिका का निवर्हन कर रहे थे लेकिन इन सबके साथ साहित्य जगत के भीतर एक ऐसे विषय पर गहन दृष्टिपात का सिलसिला शुरु हो रहा था जिसे जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हुए भी उपेक्षित रखा गया था और वह है मृत्यु। हाँलाकि साहित्य में इसके समावेश के पीछे बहुत सारे सामाजिक, राजनैतिक कारण रहे जिनमें विश्व युद्ध की महत्वपूर्ण भूमिका रही फिर भी ऐसा नहीं था कि मृत्यु हमारे लिए कोई अनजाना विषय थी। लेकिन जीवन के साथ उसके गहनतम बारीक जुड़ावों को देखने समझने का इतना सफल प्रयास शायद ही कभी किया गया था। निर्मल वर्मा का अन्तिम अरण्यउपन्यास इन्ही सफलतम प्रयासों में से है।
            ‘’अन्तिम अरण्यजीवन यात्रा का एक ऐसा आख्यान है जिसमें यात्रा करना यात्री की मजबूरी बेबसी से ज्यादा अपने रिसते हुए दुःखों के बह जाने का इन्तजार करना है और फिर भी किसी निष्कर्ष पर पहुँचाना शेष ।
परिवार का सुख, दुनियाँ में रहने का सुख.........आदमी क्या सारी मारकाट इन सुखों के लिए नहीं करता ?’’ 1
 अन्तिम अरण्यकी इन पंक्तियों के साथ निर्मल मनुष्य के भीतर की एक यात्रा पर निकलते हैं, सुख.....सुख जिसकी तलाश करता हुआ व्यक्ति अपने जीवन को ना जाने कितने पुलों , नदियों, घाटियों और जंगलों की यातना भरी यात्राओं से गुुुजरता है और अन्ततः भी सुख की ही तलाश शेष रह जाती है क्योंकि
‘‘वह अपने चिमटे से सुख नही उसकी राख उठाने आता है...2
यात्रा के अन्तिम पड़ाव पर पहँुचते पहुँते सुख का राख में तब्दील हो जाना क्या जिन्दगी के प्रति सौन्दर्यबोध का चुक जाना नहीं? महेरा साहब, दीवा, तिया, निरंजनबाबू, अन्ना जी और मैं (दिल्ली वाले बाबू) उपन्यास के भीतर इसी राख को अपने-अपने तरीके से समेटते चलते है।
            स्मृतियों के लोक में चलता सम्पूर्ण उपन्यास व्यक्ति सम्बन्धों के भीतर एक गहन तनाव और संवेदना की कई परतों को खोलता है-
‘‘जिसे हम अपनी जिन्दगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते है, वह चाहें कितना यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उससे हमें शान्ति मिलती है।.............जीवन के तमाम अनुभव एक महीन धागे में बिधे जाने पड़ते है। यह धागा न हो, तो कही कोई सिलसिला नही दिखाई देता, सारी जमा पूँजी इसी धागे की गाँठ से बँधी होती है, जिसके टूटने पर सबकुछ धूल में मिल जाता है।’’ 3
लेकिन व्यक्ति जीवन की त्रासदी यह है कि सम्बन्धों का धागा टूट कर भी स्मृतियों के जरिये हमसे जुड़ा रहता है-व्यक्ति दूर जाकर भी आपसे कभी दूर नहीं जा पाता।
निर्मल वर्मा ने उपन्यास में जीवन और मृत्यु के बीच घटित हो रहे समय को अपने बेमिसाल कथाशिल्प के जरिये तीन भागों में बाँटते हुए समय में घटित हो रहे द्वन्द्व और उलझाव को, उतार और चढ़ाव को जिस तरह व्याख्यायित किया है वह पाठक को भ्रमित नहीं करता बल्कि वास्तविक मन की स्थितियों के और करीब पहुँचाता है। स्मृतियाँ कभी स्थाई नही होती और न क्रमबद्ध होती हैं इसलिये उनके साथ उलझाव का होना स्वभाविक है साथ ही साथ इस शिल्प की खासियत यह है कि रचना कभी भी किसी काल विशेष से जुड़कर नही चलती। प्रत्येक काल और समय का पाठक उसे अपने से जोड़ सकता है।
            मृत्यु जीवन में आने वाली कोई घटना नहीं जिसे अपने ऊपर से गुजर जाने दिया जाये, बल्कि वो तो जिन्दगी के भीतर ही रिसता एक अकेलापन है जो चरम अवस्था में पहुँच कर खुद को शरीर से भी अकेला कर लेना चाहता है।
इससे ज्यादा भयानक बात क्या हो सकती है कि कोई आदमी अकेलेपन के अनजाने प्रदेश की और घिसटता जा रहा हो और उसके साथ कोई न हो। कोई आखिर तक साथ नही जाता, लेकिन कुछ दूर तक तो साथ जा सकता है।’’ 4
और निर्मल इस अकेलेपन का बहुत कुछ कारण जिन्दगी में गलत चयनों को मानते है जिसे हम जीना चाहते है वो जीते नही और जो हमारा अपना था उसे अपने तक पहुँचने नहीं देते-
‘‘जानते हो, इस दुनियाँ में कितनी दुनियाऐं खाली पड़ी रहती हैं, जबकि लोग गलत                जगह पर रहकर सारी जिन्दगी गवाँ देते है... 5
 लेकिन पुनःएक सवाल और खड़ा करते है कि सही जगह का चयन क्या वाजिब है ? क्या एक समय बाद सारे चयन गलत नही लगते ,
‘‘कभी तो समझ मे नही आता ........कौन सी जिन्दगी असली है, यह या वह .....या दोनों में से कोई नही’’ 6
‘‘क्या एक उम्र के बाद आदमी जीता एक तरफ है और जागता दूसरी तरफ ? जब सचमुच जागता है, ैतब पता चलता है, जीने का अर्थ पता नहीं कहाँ रास्ते में छूट गया’’ ...7
ऐसे तमाम सवालों से जूझता निर्मल का यह उपन्यास रिश्तों की बारीक टूटन की ओर हमारा ध्यान खिचता है। तिया अपने पिता मेहरा साहब से प्यार करते हुए भी भागती रहती है उसका मानना है-
‘‘ रिश्ते होते नही बनते हैं... जब तक टीस नही उठती पता नही चलता वे कितने पक गए है...... 8
तिया और मेहरा साहब के बीच
 ‘‘रिश्ते की आद्रता नहीं, एक क्लीनिकल किस्म का सूखापन है... 9
यह सूखापन’’ इसलिए नही कि दीवा मेहरा साहब की दूसरी पत्नी के रुप में उपस्थित है बल्कि अपनी मां का अभाव उसे दीवा और मेहरा साहब के करीब कभी आने नही देता । भारतीय सन्दर्भ में परिवारिक रिश्तों की जो महीन बुनावट है उसमें सम्बन्धों के लिए किसी प्रकार के स्पेस की गुंजाइश नहीं दिखती और नतीजतन एक अजीब तरह की जबरदस्ती में जिते हुए रिश्तों की उम्र तो गुजर जाती है लेकिन जिन्दगी नहीं। निर्मल के पात्र एक विशेष किस्म के बौद्धिक और सामाजिक वर्ग से आते है जो भावात्मक द्वन्द्व के उलझाव में खुद का आकलन करते रहते हैं भीतर का द्वन्द्व जहाँ एक ओर उन्हे जिन्दगी की ओर खिचता है वही दुगने वेग से अतीत के अकेलेपन में जाता है।
‘‘हमारा अतीत कोई एक जगह ठहरा हुआ स्टेशन नहीं है, जो एक बार गुजरने के बाद गायब हो जाता है, वह यात्रा के दौरान हमेशा अपने को अलग-अलग झरोखों से दिखाता रहता हैं... 10
अकेलेपन की पीड़ा बदलते आधुनिक समय में रिश्तों के छीज जाने की ओर ही संकेत है और बहुत कुछ यह भी आग्रह करती है कि क्या रिश्तों सम्बन्धों के दायरे में सिमट कर ही जिन्दगी जीने की विवशता रहने दी जाये ? या जिन्दगी को जिन्दगी की तरह मुक्त भाव से जीने की कला का विकास किया जाये, जहाँ व्यक्ति को अपना स्वतन्त्र आकाश अपनी स्वतन्त्र धरती और अपनी साँसो में खुली और ताजी हवा का संचार महसूस हो ? उपन्यास में निरजन बाबू और मैं का अकेलापन कुछ इसी तरफ संकेत करता दिखाई देता है-
‘‘ इससे बड़ा कोई धोखा नहीं.......कोई भी सिरा पकड़ो वह आगे किसी और सिरे से बंधा होता है और तो और जब आदमी पैदा होता है तो भी वह कोई शुरुआत नहीं है। पता नहीं अपने साथ कितने सारे पुराने किए गुजरे की पोटली साथ ले आता है‘‘.... 11
रिश्तों और सम्बन्धों से परे अकेलेपन का एक रुप निराशा का भी है और यह निराशा है जिन्दगी के महत्वहीन हो जाने की । द्वितीय विश्वयुद्ध से उपजी त्रासदी का व्यक्ति जीवन मूल्यों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा था, उपन्यास में अन्नानामक पात्र इसी प्रकार के प्रभाव से गुजरती दिखाई देती है। शान्ति और सुख की तलाश से परे अपने होने को समझने के भटकाव को लेकर अन्ना’’ जी का भारत के इस पहाड़ी क्षेत्र में ठहराव इसी ओर संकेत है। 
‘‘जब हम अपने को ही बाहर से देखने लगते है.... हम जैसे खुद अपने ही दर्शक बन जाते है....अपनी देह के...............मेरे  और मेरे बीच कोई तीसरा भी हो सकता है, मैं इसकी कल्पना भी नही कर सकती थी।‘‘ 12
 अपने लोग अपनी जमीन से परे अनाजने देश के एकान्त में जिन्दगी के बीत जाने का इन्तजार, जिसकी पहुँच मृत्यु के सफर तक जाती है।
निर्मल वर्मा पर अक्सर ये आरोप लगाये गये कि उनका लेखन भरतीय परिवेश और उसकी जमीनी हकीकत से परे एक अभिजात्य किस्म का लेखन है, लेकिन क्या अभिजात्य किस्म का लेखन कह कर निर्मल के लेखन  को खारिज किया जा सकता है ? शायद नहीं। अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों की अपेक्षा अन्तिम अरण्यमें निर्मल बहुत हद तक अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते दिखते है लेकिन निर्मल का लेखन एक विशेष प्रकार की वैचारिक समझ की मांग करता है, सतही तरीके से उनके लिखे को व्याख्यायित करना उनका उचित मूल्यांकन नही ।
भारतीय परिवेश में मृत्युभी एक संस्कार के रुप में समाहित है, निर्मल बड़े ही बोल्ड तरीके से मृत्यु बोध के साथ भारतीय जीवन दर्शन को जोड़कर आशावादिता का संकेत तो करते हैं लेकिन व्यक्ति के आस्तित्व को भी खारिज नहीं करते । ये बहुत हद तक निर्मल वर्मा का जीवन को उसके व्यापक फलक में देखने की सोच है। उपन्यास के अन्त में निर्मल मृत्युको एक घटना के रुप में ही देखने का संकेत करते है जो घटित किसी अपने पर होती है किन्तु
’’पीड़ा बाद में आती है, काल की तपन में बूँद-बूँद पिघलाती हुई’’ 13
 और यही पीड़ा जीवन के प्रति गहरी उदासी का सबब बनती हैं लेकिन  अन्ततः लौटना जिन्दगी की तरफ ही होता है।
कुल मिलाकर निर्मल वर्मा का उपन्यास अन्तिम अरण्यएक यात्रा से गुजरते यात्री के भीतरी गुम्फनों की पड़ताल है जिसमें वह कई बार उलझता, गिरता है और पुनः उठकर अपने पैर पर चलने की कोशिश करता है, ताकि मंजिल तक पहुँचना आसान हो, अगर वो मंजिल मृत्यु ही है तो भी पूरी तरह से मुक्त ‘‘ यह दुनियाँ किसी हवेली की सिर्फ एक मंजिल है, बाकी सारे कमरे किसी ऊपरी मंजिल पर है, जो तभी दिखाई देते है, जब हम अपनी मंजिल से बाहर निकलते है... 14

सन्दर्भ ग्रन्थ:-
1. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 62)
2. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 62)
3. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 10)
4. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 136)
5. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 138) 
6. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 61)
7. (अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा पृ0 133)
8. (अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा पृ0 93)
9. (अन्तिम अरण्य, पृ0 100)
10. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0 179)
11. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0133)
12. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0202)
13. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0202)
14. (अन्तिम अरण्य, निर्मल वर्मा पृ0181)
                                                           
                                                                                               
                            डॉ0 शिवानी गुप्ता
                                                             वाराणसी।
                                       संपर्क - 9198241570, 8932882061
                      

 



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, July 8, 2015

तेजेन्द्र शर्मा की कहानी




यह सन्नाटा कब टूटेगा...? 
(यह कहानी दीवार में रास्ता संग्रह से साभार)
    तेजेन्द्र शर्मा

आज फिर अलार्म सुबह 5.15 पर बज उठा।
वह यंत्रवत् उठा और अपने ब्लैकबैरी फ़ोन पर अलार्म को डिसमिस कर दिया। उसका सुबह का शेड्यूल हमेशा एकसा ही रहता है। अलार्म बन्द करना; बिस्तर से निकलना; बिस्तर को सीधा करना और रज़ाई को ठीक से बिछाना; फिर एक अंगड़ाई लेना; अपना पायजामा उठा कर पहनना और पहनते पहनते ही बाथरूम की तरफ़ चल देना। आंखें भी बेडरूम से बाथरूम तक आते आते ठीक से खुल पातीं हैं।
बाथरूम जाते जाते एक पल के लिये रुक जाता है। अपना लैपटॉप ऑन करता है। कुछ आवाज़ें आनी शुरू होती हैं। थोड़ी देर में लैपटॉप चलना शुरू कर देता है। विंडोज़-7 अपने शुरू होने की सूचना भी बहुत मधुर सुरों में देता है। इस बीच वह अपने अंग्रेज़ी टूथ ब्रश पर भारत से मंगवाया आयुर्वेदिक पेस्ट लगाता है और दांत साफ़ कर लेता है। दांत साफ़ करने के बाद जीभी से अपनी ज़बान ज़रूर साफ़ करता है।
उसे हिमालय टूथपेस्ट का स्वाद बहुत पसन्द है। हिमालय कम्पनी के नाम से उसकी  बचपन की यादें जुड़ी हैं। किशनगंज के वैद्य जी उसे अपनी दवाओं के साथ साथ लिव-52 नाम की दवा दिया करते थे। इस टूथपेस्ट से उसकी पहचान भोपाल के एक होटल में हुई। पेस्ट की एक छोटी सी ट्यूब रखी थी उस होटल के टॉयलट में। उसे अपने पिता की कही बात याद आ गई, भला सुबह सुबह हम अपने मुंह में फ़्लोराइड या फिर अन्य कैमिकल क्यों डालें। जब आयुर्वेद हमारे लिये जड़ी बूटियां इस्तेमाल करता है, हम क्यों अंग्रेज़ी दवाइयों और वस्तुओं का प्रयोग करते हैं? ”
वैसे आयुर्वेदिक टूथपेस्ट तो लंदन में भी मिलते हैं। डाबर, नीम, और स्वामी नारायण मंदिर वाले सभी आयुर्वेदिक दवाएं और रोज़मर्रा के इस्तेमाल के आयुर्वेदिक उत्पाद बनाते हैं। मगर भारत से अपनी पसन्द की वस्तु दोस्तों से मंगवाने का सुख ही अलग है। उसके बचपन की यादों में बोरोलीन, सुआलीन, निक्सोडर्म, अफ़ग़ान स्नो, सिंथॉल साबुन, अमूल मक्खन, और रूह अफ़ज़ाह शर्बत आज भी घर बसाए बैठे हैं।
एक उहापोह भी होती है कि पहले नहा ले या फिर चाय बना ले।  फिर वापिस लिविंग रूम में आता है और कम्पयूटर पर अपना जी-मेल अकाउण्ट खोलता है। एक सरसरी निगाह से देखता है कि कहां कहां से ई-मेल आए हैं। अगर कोई महत्वपूर्ण ई-मेल दिखाई देता है तो ठीक, वर्ना वापिस टॉयलट की तरफ़ चल देता है। वैसे कभी कभी लैपटॉप उठा कर टॉयलट में भी ले जाता है। और टॉयलट सीट पर अपने आपको समझाता है कि आज बाबा रामदेव की बात मान ही लेगा। कपाल भाती और अनुलोम विलोम कर ही लेगा। कबसे अपने आपको तैयार करता आ रहा है कि उसे यह क्रिया निरंतर रूप से करनी चाहिये।
होता वही है जो रोज़ाना होता है। टायलट से निवृत्‍त होते होते और स्नान पूरा करते करते समय अधिक लग जाता है। ऐसे में सबसे पहले बलि का बकरा बनते हैं कपाल भाती और अनुलोम विलोम। लगता है कि जैसे दोनों प्राणायामों की रिहर्सल सी की हो उसने। न तो गर्दन और कंधों की एक्सरसाइज़ कर पाता है और न ही प्राणायाम। बस सैण्डविच बनाता है, चाय बनाता है, एक डाइजेस्टिव बिस्कुट निकालता है और चाय पीने बैठ जाता है। उसके घर में चाय की पत्ती की जगह टी-बैग ही आते हैं।
उसने एक नया तरीक़ा निकाल लिया है कि टी-बैग की चाय में बम्बई की चाय की पत्ती वाला ज़ायका आने लगे।  वह कप में दो टी-बैग डाल कर उस में दूध डालता है और माइक्रोवेव अवन में चालीस सेकण्ड तक उबालता है। दूसरी तरफ़ इलेक्ट्रिक केतली में पानी उबलने के लिये रख देता है। चालीस सेकण्ड बाद कप बाहर निकाल कर दूध में टी-बैग हिलाता है और उसमें एक गोली स्पलैण्डा (रासायनिक चीनी) की डालता है। उस पर केतली में से उबलता पानी डालता है। एक मिनट के बाद विशुद्ध भारतीय चाय तैयार हो जाती है।
वह परेशान है कि आजकल घर से दफ़्तर पहुंचने में एक तरफ़ लगभग दो घंटे लग जाते हैं। यानि कि एक सप्ताह में बीस घंटे वह रेलगाड़ी में ही बिता देता है। जबकि पुराने दफ़्तर में जाने के लिये करीब पैंतीस से चालीस मिनट ही लगते थे। यदि वह लिखना चाहता तो इन चालीस घंटों में से कम से कम पांच घन्टे तो साहित्य सृजन में लगा सकता था। अब उसे अपने मित्र दिवाकर का लेखकीय सन्नाटा समझ आने लगा था। न लिखने के कारण भी महसूस होने लगे थे। वह शनिवार को अवश्य ही सैंगी से बात करेगा।
सैंगी उसकी ब्याहता पत्नी नहीं है। बस दोनों साथ साथ रहते हैं। दोनों जीवन में उस समय मिले जब उनके अपने अपने जीवन साथी राह में ही छोड़ अलग राह पकड़ कर चल दिये। दोनों की राय विपरीत सेक्स के लिये ख़ासी नकारात्मक हो गई थी। मगर फिर भी दोनो को एक दूसरे में ही अपना अपना पूरक दिखाई दिया। हिन्दी का बिगुल बजाने वाला वह अचानक ब्रिटेन की वेल्श लड़की के साथ एक ही छत के नीचे रहने लगा।
वैसे उसका नाम एलिज़बेथ है। सब प्यार से उसे लिज़ कहते हैं। अब क्योंकि दोनो ने विवाह नहीं किया और पार्टनर बन कर एक ही छत के नीचे रहते हैं, इसलिये वह उसे संगिनी कहता है और फिर संगिनी प्यार से सैंगी बन गई। घर सैंगी का है मगर घर का ख़र्चा सारा वह स्वयं ही चलाता है। सैंगी बहुत कहती है कि मिलजुल कर हो जाएगा।  मगर नहीं, वह नहीं माना तो नहीं ही माना।
सैंगी के साथ कभी कभी छोटी छोटी बातों पर बहस भी हो जाती है। शायद इसीलिये सैंगी ने वापिस अपना कॉलेगट टूथपेस्ट इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। घर में दो लोग हैं और दो तरह के टूथपेस्ट ! वह हमेशा अपने पेस्ट को नीचे से दबाता है और नीचे से बिल्कुल फ़्लैट करते हुए ऊपर की ओर बढ़ता है। जबकि सैंगी को कोई फ़र्क महसूस नहीं होता कि पेस्ट की ट्यूब कहां से दबाई जा रही है। वह समझाती भी है कि इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि ट्यूब कहां से दबा कर पेस्ट निकाली जा रही है। भला इसमें कल्चर और परवरिश और दूसरी बड़ी बड़ी बातें कहां से आ गईं। सैंगी हमेशा बहस से बचना पसन्द करती है। अब तो वह स्वयं भी महसूस करने लगा है कि सैंगी से भला क्या बहस।
दरअसल सैंगी शाम को काम करती है। जब वह काम से लौटता है तो सैंगी जा चुकी होती है। जब तक वह वापिस लौटती है वह गहरी नींद में होता है। इसलिये दोनों को बात करने का समय भी शनिवार और रविवार को ही मिलता है अन्यथा बस एक दूसरे की ज़रूरत पूरी करने के अतिरिक्त कोई और संपर्क नहीं। हां जबसे वह इस नये दफ़्तर जाने लगा है उसके जीवन में बहुत से परिवर्तन आने लगे हैं। 
अब उसे सुबह सात बज कर तीस मिनट की गाड़ी लेनी पड़ती है। इसी से सारा जीवन बदल सा गया है। उसका दफ़्तर न्यू क्रॉस गेट में है। रहता है हैच-एण्ड में। घर से स्टेशन करीब पंद्रह मिनट की पैदल दूरी पर है। इसलिये सात बज कर दस मिनट तक चल देता है।  हैच-एण्ड से ओवरग्राउण्ड की यानि कि अपनी ही कम्पनी की रेलगाड़ी लेता है। तीस मिनट में यानि कि आठ बजे क्वीन्स पार्क स्टेशन पहुंचता है। वहां आठ पांच के करीब बेकर-लू अंडरग्राउण्ड लाइन से बेकर स्ट्रीट स्टेशन पहुंचता है। एक बार फिर वहां से जुबली लाइन की गाड़ी में बैठता है और लंदन ब्रिज होते हुए कनाडा वाटर स्टेशन पर उतरता है। वहां से अपनी ही कम्पनी की ईस्ट लंदन लाइन की गाड़ी में सवार हो कर पहुंचता है न्यू क्रॉस गेट। फिर वहां क़रीब पंद्रह मिनट पैदल। यानि कि घर से दफ़तर पहुंचने में उसे पूरे दो घंटे लग जाते हैं। और फिर शाम को यही प्रक्रिया उल्टी दोहराता है।
लिखने और पढ़ने का समय अब उसे नहीं मिलता है। यह ठीक है कि उसके लेखक दिमाग़ को बहुत से नये किरदार दिखाई देते हैं। उनके क्रियाकलाप देखता है। देखता है कि कैसे यहां का गोरा आदमी खाली सीट पर लपक कर बैठने का प्रयास नहीं करता। प्रवासी चाहे किसी भी देश का क्यों न हो, उसकी आंखों में सीट का लालच साफ़ दिखाई देता है। वह देखता है कि यहां के गोरे आदमी और औरत बहुत तेज़ चलते हैं। शायद गांधी जी ने भी अपनी चाल इसी देश में रह कर तेज़ की होगी।
वह स्वयं न तो तेज़ चलता है और न ही धीमा। बस मध्यम मार्ग मानने वाला है। बुद्ध की बहुत सी सीखों को अपने जीवन में अपना चुका है। सैंगी को पता ही नहीं कि वह कभी ऊंचे सुर में बात भी कर सकता है। न ज़ोर से हंसता है न ऊंचा बोलता है। सैंगी की वैसे तो अधिकतर बातें मान लेता है, किन्तु उसकी एक बात का ख़ास ख़्याल रखता है कि अपना काले रंग का बैग, जिसे सैंगी बैक-पैक कहती है, वह अपनी पीठ पर दोनों कन्धों पर बराबर लटकाता है। सैंगी को लगता है कि ऐसा न करने से इन्सान का कंधा एक ओर को झुक जाता है।
वैसे तो वह कविता भी लिख लेता है, मगर उसे संतुष्टि का अहसास कहानी लिख कर ही मिलता है। कवियों का मज़ाक उड़ाते हुए वह हमेशा कहता है, कविता लिखने के लिये प्रतिभा की आवश्यकता होती है। जबकि कहानी केवल प्रतिभा से नहीं लिखी जा सकती। उसके लिये प्रतिभा के साथ साथ मेहनत, प्रतिबद्धता एवं एकाग्रता की भी ज़रूरत होती है।
जब वह लंदन यूस्टन में काम करता था तो उसे काम पर पहुंचने में कुल मिला कर पैंतीस मिनट ही लगते थे। शाम को घर में अकेला होता था। कम्‍प्‍यूटर पर उंगलियां थिरकने लगतीं। मगर आजकल उसका पूरा शरीर इतना थका रहता है कि उंगलियां की-बोर्ड पर थिरकना जैसे भूल गई हैं।  वह घर वापिस आता है निढाल सा बिस्तर पर गिर जाता है। उसके भीतर का लेखक जैसे लिखना भूल गया है।
साल भर से सन्नाटा उसके लेखन पर छाया हुआ है। उसके भीतर की तड़प उसे कचोटती रहती है कि आख़िरकार लिख क्यों नहीं पा रहा। उसके दिल में अब भी विषय जन्म लेते हैं। वह आज भी आम आदमी के दर्द को भीतर तक महसूस करता है। मगर फिर उन विचारों को पन्नों पर व्यक्त क्यों नहीं कर पाता? उसके दिमाग़ में कहानियां जन्म लेती हैं, मगर शब्द काग़ज़ पर उतरने से इन्कार कर देते हैं। शब्दों ने जैसे विद्रोह कर दिया है। यह हुआ कैसे? शब्द अचानक उसका साथ छोड़ कर किसके साथ चले गये?
वह दफ़्तर में भी काम में मन नहीं लगा पाता। वहां कहानी के बारे में सोचता है और घर आकर दफ़्तर के काम के बारे में। एक लड़कपन सा शामिल हो गया है उसके व्यक्तित्व में। एक शरारती बच्चे की तरह जो खेलते समय स्कूल के होमवर्क के बारे में सोचता है और स्कूल में हर वक़्त खेल और शरारत उसके दिमाग़ में छाए रहते हैं। वह पिछले वर्ष भर के जीवन को एक दिन में जीकर ख़त्म कर देना चाहता है। उसका बस चले तो इस पूरे वर्ष को अपने जीवन की स्लेट से मिटा दे। मगर जीवन में ऐसा कैसे हो सकता है।
उसने स्वयं ही अपनी एक कहानी में लिखा भी था, हमारा जीवन पहले से रिकॉर्ड किया गया एक वीडियो है यानि कि प्री-रिकॉर्डिड वीडियो कैसेट और वी.सी.आर. में केवल प्ले का बटन है यानि कि इस में हम केवल वीडियो कैसेट चला कर देख सकते हैं। वहां न तो फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड का बटन है और न ही रिवाइन्ड का। यानि कि आप न तो वीडियो कैसेट को आगे वढ़ा सकते हैं और न ही पीछे ले जा सकते हैं। जो शूटिंग आप करके आये हैं, आप वही देख सकते हैं। जो स्क्रिप्ट लिखा गया और जिसकी शूटिंग आपने पहले से की है ; जिन चरित्रों के साथ जब जब शूटिंग की है, आपके जीवन में वे लोग, वे हादसे, वे पल उसी हिसाब से आते जाएंगे।
वह सोच रहा है कि इस सन्नाटे की शूटिंग क्यों की गई ? आख़िर वह कब तक लिखने के लिये संघर्ष करेगा। वह दिवाकर की तरह अनुवाद भी तो नहीं करता। उसका एक वर्ष का सन्नाटा दिवाकर के कई वर्षों के बराबर है। दिवाकर कमसे कम अनुवाद तो निरंतर करता रहा है। फिर भी सोचता है कि वह सृजनात्मक लेखन क्यों नहीं कर रहा। साल भर से तो मुक्ता भी नहीं लिख पाई है। वह शायद सोच कर ख़ुश हो रहा है कि चलो उस जैसे और भी कई हैं।
पहले वह ऐसा कदापि नहीं था। दूसरे के कष्ट और कमज़ोरी से कभी भी उसके दिल को तसल्ली नहीं मिलती। वह हमेशा दूसरे के कष्‍टों को अपना कष्ट समझता। शायद इन दोनों से प्रतिस्पर्धा की भावना रही होगी। इसीलिये उनके न लिख पाने से उसके अहम् को संतुष्टि मिल रही है। वह परेशान इसलिये भी है क्योंकि अब भारत में उसे मुख्यधारा का लेखक माना जाने लगा है। उसकी कहानियों की चर्चा शुरू हो गई है। वहां की पत्रिकाओं, समाचार पत्रों एवं इंटरनेट पर हर जगह उसके साहित्य पर बातचीत हो रही है। उसे लगने लगा है कि अगर वह एक वर्ष तक नहीं लिखेगा तो साहित्य जगत का कितना नुक़सान हो जाएगा।
वह अपने लेखन को बहुत गंभीरता से लेने लगा है और नौकरी उसे खलने लगी है। कहने को तो रेल्वे में मैनेजर है। लेकिन यह भला क्या काम हुआ। अगर उसकी पगार ठीक ठाक न होती तो कब का नौकरी छोड़ चुका होता।  वह सोचता है कि हिन्दी का लेखक केवल लिख कर क्यों नहीं खा सकता ? क्यों उसे घर चलाने के लिये दूसरा काम करना पड़ता है। मगर दूसरा काम तो वह भारत में भी करता था। यहां लंदन में इस नौकरी से पहले भी करता था। यह अचानक नौकरी से क्यों परेशान हो रहा है ? सोचता है अगर भारत वाली नौकरी में होता तो इस वर्ष अठावन का हो जाता और नौकरी से रिटायर हो जाता।
रिटायर होने की बात उसने दो दिन पहले अपनी संगिनी से भी की थी। सैंगी ने पूरे ध्यान से उसकी बात सुनी, तुम सच में इतनी घुटन से जी रहे हो ? फिर तुमने मुझे कुछ बताया क्यों नहीं ? तुम ख़ुद ही सोचो कि अगर तुम भारत में होते तो इस साल रिटायर हो ही जाते। तो तुम यहां भी रिटायरमेंट ले लो। मैं नौकरी कर ही रही हूं, तुम भी कोई पार्ट-टाइम नौकरी कर लो। हम दोनों को एक दूसरे के लिये वक़्त भी मिल जाएगा और तुम लिख भी सकोगे।
सैंगी हर बात का विश्लेषण इतनी आसानी से कैसे कर लेती है ? मैं क्यों सैंगी की तरह समझदार नहीं हो सकता ? क्यों मैं बस ईगो का मारा हूं ? वैसे इस नौकरी का एक फ़ायदा भी है। रिटायरमेण्ट की उम्र 65 साल है। यहां तो कोई किसी को सरनेम से नहीं बुलाता। मिस्टर वगैरह तो लगाने का सवाल ही नहीं होता। वह तो अपने मैनेजिंग डाइरेक्टर तक को पहले नाम से बुलाता है – स्टीव कहता है। शायद इसीलिये मनुष्य यहां जल्दी बूढ़ा नहीं होता। वह एक सेवा- निवृत्त या रिटायर्ड इन्सान नहीं कहलाना चाहता।
मगर उसके लेखन का क्या होगा ? क्या सैंगी की बात मान लेनी चाहिये ? पिछले कुछ दिनों से वह इस बात को लेकर परेशान है। हर रात तय करता है कि अगले ही दिन यह नौकरी छोड़ देगा। कल रात भी उसने यही तय किया था कि अब उसे नहीं करनी यह नौकरी, नहीं व्यर्थ करने अपने चार घंटे रोज़ाना – हैचएण्ड से न्यूक्रॉस गेट। कल रात उसने अपना स्वैच्छिक अवकाश लेने का पत्र भी बना लिया था।
मगर आज सुबह फिर 5.15 पर उसका अलार्म बजा और वही दिनचर्या एक बार फिर शुरू हो गई। वह सात तीस की गाड़ी लेने के लिये एक बार फिर स्टेशन के प्लैटफ़ॉर्म पर खड़ा है।
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तेजेन्द्र शर्मा
जन्म - 21 अक्टूबर 1952  (जगरांव) पंजाब।
शिक्षा: दिल्ली विश्विद्यालय से एम.. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा
प्रकाशित कृतियां : काला सागर (1990), ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999), यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007), सीधी रेखा की परतें (2009 - तेजेन्द्र शर्मा की समग्र कहानियां भाग-1),  क़ब्र का मुनाफ़ा (2010), दीवार में रास्ता (2012), सपने मरते नहीं (प्रकाशनाधीन) सभी कहानी संग्रह । प्रतिनिधि कहानियां - किताबघर (2014), प्रिय कथाएं (ज्योतिपर्व) (2014)।   ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह)।
*कहानी अभिशप्त चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के एम.ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल। और कहानी *पासपोर्ट का रंग गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोयडा के एम.ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल।
पुरस्कार/सम्मान: 1) केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का डॉ. मोटुरी सत्यनारायण सम्मान – 2011. 2) यू.पी. हिन्दी संस्थान का प्रवासी भारतीय साहित्य भूषण सम्मान 2013. 3) हरियाणा राज्य साहित्य अकादमी सम्मान – 2012 4) ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार  - 1995 प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों । 5) भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा डॉ. हरिवंशराय बच्चन सम्मान (2008)
संप्रतिः ब्रिटिश रेल (लंदन ओवरग्राउण्ड) में कार्यरत।
संपर्क : 33-A, Spencer Road, Harrow & Wealdstone, Middlesex HA3 7AN (U. K.).
Mobile: 00-44-7400313433E-mail: kahanikar@gmail.com , kathauk@gmail.com

 

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad